लघुकथा
लघुकथा
मानसिक बदलाव
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आज नूपुर ने अमेरिका में मंंजरी से उसके घर में शादी कर ली।पूरे तीन दिन तक खूब शोर शराबा रहा हर रीत पूरी हुई मगर विदाई की जो रीत शादी के बाद होती है वह आज से एक साल पहले ही हो गई थी जब नूपुर ने अमेरिका में रह रही अपनी भारतीय लेस्बियन दोस्त मंजरी से शादी करने का फैसला लिया था । मंजरी और नूपुर दोनो एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे और दोनों की मुलाकात दिल्ली में हुई थी, जब मंजरी अपनी किसी मीटिंग के लिए दिल्ली आई थी। मंजरी के परिवार में पिता और अमेरिकन मां थी। जब वह पांच साल की थी तब उसकी अपनी मां गुजर चुकी थी और कुछ समय बाद उसके पिता उसे लेकर अमेरिका आ गए थे और अमेरिका आने के दो चार महीने बाद ही उन्होंने कैथरीन से शादी कर ली थी। विवाह सम्पन्न होने के बाद सब लंच में बिजी हो गए थे और नूपुर बीती यादों में खो रही थी।
नुपुर को आज भी वह दिन याद है जिस दिन उसे एक तूफान का सामना करना पड़ा था। जिस घर में उसे लाड़ ,प्यार और सम्मान मिलता था,वहाँ उसकी एक सच्चाई ने पूरे घर के लोगों में उसके लिए तिरस्कार की भावना भर दी।
नुपुर की आंखों में वह वाक्या एक चलचित्र की तरह घूमने लगा।
उस दिन सब नेटफ्लिक्स पर "बधाई दो" फिल्म देख रहे थे जो लेस्बियन लोगों को आधार बनाकर बनाई गई थी। फिल्म शुरू हुई और लोगों के तर्क वितर्क का दौर भी शुरू हुआ। वह खामोशी से सबके चेहरे पर बनते बिगड़ते हाव भाव का आकलन कर रही थी।
फिल्म की गति बढ़ी और देखने वालों की सोच में भी प्रगतिशीलता दिखी । मम्मी कहने लगी "इन लोगों के जीवन में भी सुधार होना चाहिए, आखिर ये भी तो इंसान है"
भाभी ने भी कहा "सही कह रही हैं आप मम्मी जी" और फिल्म के क्लाइमेक्स ने तो पूरे परिवार की समझ और सोच को ऊंचे शिखर पर बैठा दिया । जब फिल्म देखकर मम्मी उठी तो उन्होंने कहा "बहुत ही अच्छा अंत था,परिवार के लोग ही नहीं समझ पाएंगे अपने बच्चों को तो कौन समझ पाएगा"
उनकी बातें सुनकर उसके मन को पक्का भरोसा हो गया कि उसका परिवार उसे समझेगा ,सच्चाई जानकर भी उसे उसी तरह से अपनापन और सम्मान देगा- जैसा अभी दे रहे हैं।
उस रात बहुत हिम्मत करके उसने कहा "आपको समलैंगिक रिश्तों पर बनी फिल्म अजीब नहीं लगी"?
सबने एक साथ कहा "अजीब!!! इतनी अच्छी तो फिल्म थी ।
उसने फिर हिचकिचाते हुए कहा "अगर आपको पता लगे कि आपके परिवार का कोई सदस्य इसी क्यूनिटी को बिलोंग करता है तो आप क्या कहेंगे?"
इतना सुनते ही मम्मी के हाथ से चम्मच छूटकर प्लेट में गिर गई और तीखे स्वर में उन्होंने कहा "क्या !! कक..क्या कह रही हो ?"
पूरा परिवार एक दूसरे को शक की नजरों से देखने लगा और अपनी अपनी कुर्सी को थोड़ा थोड़ा सरकाने लगे.....
नूपुर ने टूटे फूटे अल्फाज में कहा "मम्मी पापा मैं .... वोss मैंss हूं। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी जुबान पत्थर सी हो गई है फिर भी बड़ी मुश्किल से उसने कहा "वह मैंss ही हूं...उसके मुंह से इतना सुनते ही सब भौचक्के से एक दूसरे का चेहरा देखने लगे।
जो सोच और समझ फिल्म देखकर उच्च शिखर पर पहुंची थी ,अपनी खुद की बेटी की सच्चाई जानकर किसी कीचड़ में रेंगने वाले कीड़े जैसी हो गई ।
भैय्या तैश में आकर जोर जोर से बोलने लगे "फिल्म से अपने आपको कंपेयर करती हो "? और फिर वह कहने लगे "फिल्म दो तीन घंटे का खेला होता है नूपुर उसमें कुछ भी कल्पना करना अलग बात है । आशावादी होना एक सीमा तक ही अच्छा लगता है फिल्मों में जो कुछ भी दिखाया जाता है उसे देखकर हम वाह वाह कर सकते हैं उसे अपना नहीं सकते । जिंदगी फिल्म नहीं होती ,यहां हर दिन सच्चाई से दो चार हाथ करना पड़ता है" इतना कहते हुए वह दन दनाते हुए अपने कमरे में चले गए और पीछे पीछे भाभी भी। मां रो रोकर ईश्वर को कोस रही थी और पिता के चेहरे पर जैसे मातम छाया हुआ था जो किसी की मौत के बाद लोगों के चेहरे पर नजर आता है। उन्होंने अपने चेहरे को अपने दोनों हाथो से ढक रखा था।
किसी ने उसके कोमल ह्रदय के नाजुक से अहसास को नहीं छुआ सबके अल्फाज और व्यवहार में कैक्टस सी चुभन थी।
उस रात तन्हा कमरे में वह देर तक रोती रही । रोते रोते कब उसकी आंख लग गई,उसे पता ही नहीं चला।
सुबह हुई तो उसने देखा कोई उसकी तरफ ही नही देख रहा था सब किसी यंत्र की तरह अपने अपने काम में लगे हुए थे। डाइनिंग टेबल पर जैसे ही वह नाश्ते के लिए बैठी तो सब अपनी अपनी प्लेट लेकर ड्राइंग हॉल में जाकर बैठ गए। वह तड़प उठी उसने चीखते हुए कहा "क्यों कर रहे हैं आप सब लोग मेरे साथ ऐसा"? क्या ऐसा होना मेरी अपनी मर्जी है !!!" । वह फफक कर रो पड़ी और सब खामोश रहे।
दो महीने उसने घर में अजनबियों की बिताए।
मंजरी को घर में हुई घटना के बारे में उसने सब कुछ बता दिया, सुनकर उसने कहा "नूपुर संभालो अपने आपको, यहां आ जाओ।" मगर वह उलझन में रही क्या करूं ? कहां जाऊं ? कैसे छोड़ूं अपनों को ? हर दिन निराशा के समंदर में खुद को डूबते देखती रही ।
तभी एक दिन मंजरी के पिता का फोन आया "बेटा आप यहां आ जाओ "ऐसे माहौल से बाहर निकलो" यहाँ वह घुटन और संकीर्णता नहीं है जो हम इंडिया में फेस करते हैं। यहां की हवा में बदलाव की महक है, अब बस आ जाओ आप" इतना कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया।
उनकी बातों को सुनकर नूपुर में एक हौसला जागा और एक उम्मीद दिखाई दी।
दो चार दिन बाद उसने अमेरिका के लिए टिकिट बुक करवा लिया।
जिस दिन उसे निकलना था उससे पहले रात में उसने मां के पास जाकर कहा" मैंने सोचा था कि तुम मुझे समझोगी ", मगर तुम भी.....खैर ...(उसने मंजरी के साथ उसके रिश्ते के बारे में कुछ नहीं बताया था किसी को )
उसने आगे कहा "मैं कल अमेरिका के लिए रवाना हो रही हूं, मेरी कंपनी मुझे तीन साल के लिए वहां भेज रही है" । उसके अमेरिका जाने की बात सुन मां पास रखे सोफे पर धम्म से गिर गई । नूपुर दौड़कर उनके पास गई और कहा "मां संभालो अपने आपको "। मां चाह रही थी की वह अपनी बेटी को रोक ले उसे गले लगा ले मगर समाज और परिवार के खौफ़ ने उनके हाथ बांध दिए थे । दोनों की आंखो में आंसुओ का ज्वार था एक सैलाब था जो बाहर बह जाना चाह रहा था मगर किसी तरह नूपुर ने अपने आप पर काबू रखा, फिर तेज़ी से पलटी और तेज कदम लेते हुए कमरे से बाहर निकल गई।
किस तरह उसने पैकिग की ,कैसे उसने अपने घर को, अपनों को आखिरी विदाई दी और कब हवाई जहाज में बैठ अमेरिका पहुंची उसे कुछ याद नहीं। अमेरिका पहुंच वह गर्ल्स हॉस्टल में रही जबकि मंजरी और उसके परिवार ने उसे उनके साथ रहने को कहा भी मगर वह नही मानी।
आज एक साल बाद उसकी शादी हो गई मंजरी से । सब बहुत खुश हैं । वह सोचने लगी किसी भी देश का कानून तभी सफल होता है जब वहां के लोग उसे दिल से अपनाते हैं । हमारे देश में हम जैसे लोगों के लिए भले ही कानून बदले मगर वह कभी सफल नहीं हो पाएगा क्योंकि जहां के लोगों की सोच ही संकीर्ण हो ,जिनकी समझ के ताले सदियों की परंपरा का हवाला देते हुए बंद हो चुके हों, वहां हर कानून की धज्जियां ही उड़ेंगी .... ठंडी आह भरती हुई वह मंजरी की तरफ बढ़ गई।

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